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भगवान का विषाणु अवतार – वुहान से विस्तार : काल्पनिक शोध कथा

ये कहानी पौराणिक कथाओं, किवदंतियों और आधुनिक विश्व की घटनाओं से प्रेरणा लेकर बनाई गई है और लेखक द्वारा इन विषम परिस्थितयों को एक नए और अलग रोचक तरीके से प्रस्तुत करने का एक प्रयास है। ये कहानी किसी भी प्रकार की सत्यता का कोई दावा नहीं करती।।

“भगवान का विषाणु अवतार – कोरोना” के प्रथम अध्याय : अवतार अध्याय, में आपने पढ़ा कि कैसे प्रकृति की समस्याओं का समाधान करने प्रभु अन्य देवी देवताओं के साथ कैसे पृथ्वी पर विषाणु रूप में अवतार लेते हैं।

और अब आगे .….

१४ अप्रैल २०२०

भारत के इंदौर शहर के समीप क्षिप्रा नदी में शेषनाग की नौका सवारी करते हुए प्रभु विश्राम कर रहे थे और तभी नारद मुनि पधारते हैं।

क्षिप्रा नदी में प्रभु

नारायण नारायण, प्रणाम भगवन!

आइए आइए नारद जी, क्या समाचार है।

प्रभु पहले ये बताइए आप कहां थे ? चीन लोक में पुष्पक विमान के उतरने के बाद से आज आपके दर्शन हुए। नवंबर २०१९ से आपको ढूंढने का प्रयास कर रहा हूं। कल तक तो आप वॉट्सएप पर ऑनलाइन भी दिखते थे पिछले आठ घंटे से तो आपका मोबाइल भी बंद आ रहा था कहां थे आप? प्रभु उठकर बैठ गए और नारद जी की ओर द्रवित आंखों से देख कर बोले। मुनिवर, १३ अप्रैल को भोलेनाथ दुविधा में फस गए थे।

प्रभु उन्हें तो आपने तांडव मचाने पुलिस अवतार में पृथ्वी वासियों को आपके प्रकोप से बचाने भेजा था।

हां नारद जी, परन्तु आप शिव शंकर को जानते हैं। उनका क्रोध अधिक समय के लिए कहां रहता है। जैसे ही पृथ्वी वासी उनके तांडव से डर कर अपने घरों में ताला नीचे हो गए, भोले भंडारी को दया आ गई। वे स्वयं को मुश्किलों में डाल कर कभी उन तक भोजन साम्रगी पहुंचाते तो कभी डमरू बजा कर मधुर ध्वनि सुना कर उनका मनोरंजन करते। परन्तु, मानव कब रक्षकों के प्रति कृतज्ञ रहा है। कल जब शिव उत्तरी भारत में पुलिस रूप में तैनात थे, कुछ असामाजिक तत्वों का एक दल हिंसक रूप में उन पर टूट पड़ा।

प्रभु, भगवान् शिव तो सर्व शक्तिमान हैं उनके साथ कोई ऐसा कैसे कर सकता है।

नारद जी, बिल्कुल नहीं कर सकता। चाहते तो शिव उसी समय त्रिशूल से उस उद्दंडी का सर धड़ से अलग कर देते। परन्तु शिव जी तो रक्षक के रूप में थे, भक्षक कैसे बन जाते, परन्तु उन सभी अपराधियों को बंदी बना लिया गया है। हालांकि, इसके पीछे एक प्राचीन लीला का रहस्य भी छुपा था। आपको याद होगा कि मां पार्वती की सुरक्षा में तैनात उनके पुत्र श्री गणेश का भगवान शिव ने अनजाने में सर काट दिया था।

यह बात मेरे, ब्रह्मा जी और स्वयं शिव जी के अलावा कोई नहीं जानता कि उस समय माता पार्वती ने क्रोध में उन्हें श्राप दे दिया था कि एक अवतार में जब वो भी रक्षक की भूमिका में होंगे तो, उनका भी कोई एक दिन इस तरह हाथ काट देगा। परन्तु, जब सभी देवताओं ने मिल कर गणेश जी के सर पर हाथी का सिर पुनर्स्थापित कर दिया तो ब्रह्मा जी के कहने पर माता पार्वती ने भी अपने श्राप को कम कर दिया और कहा कि अगर ब्रह्मा जी चाहेंगे तो सात घंटे की अभूतपूर्व शल्य चिकित्सा के बाद आपका हाथ जोड़ पाएंगे। मैं पिछले आठ घंटे से राजा अमरिंदर सिंह के राज्य में देवी चंडी के गढ़ में स्थित प्रज्ञाई चिकित्सालय में उसी शल्य चिकित्सा में ब्रह्मा जी के चिकित्सक अवतार के साथ खड़ा था

प्रभु ऐसे पापी किसी ना किसी रूप में पूरे विश्व में व्याप्त हैं, कभी तो वे ब्रह्मा जी रूपी चिकित्सक दल को आहत करते हैं तो कभी पुलिस रूपी शिव शंकर को। परन्तु आप निश्चिंत रहिए प्रभु मैं भी अपने मीडिया रूप में ऐसे पापियों को पूरे विश्व के सामने रात में नौ बजे बीस बीस मिनट ऐसा धोता हूं कि इनको दिन में समस्त ब्रह्मांड दिखाई दे जाता है। अगर अंजना ओम कश्यप या रुबिका लियाकत जैसे शांत स्वरूप में ये समस्त मानव जाति से क्षमा नहीं मांगते तो मैं विकराल अर्णब रूप धारण कर इन्हें गो-स्वामी के चरणों में लाकर पटकता हूं।

शांत नारद जी शांत, आप अपने डीडी न्यूज़ अवतार में आ जाइए, अब चिंता का विषय नहीं है। शिव जी अब बिल्कुल ठीक है और अनेक रूपों में ऐसे उद्दंडियों को तांडव की सबसे विशेष रासुका मुद्रा दिखा रहे हैं।

तांडव मुद्राएं

आप अपने मीडिया रूप में सौहार्द और शांति बनाए रखें ताकि कुछ उग्र लोगों के कारण मानव जाति परस्पर प्रेम और एकता को ना भूले। वो पहले ही एक संकट से जूझ रहे हैं। इस समय मैं कोई नया संकट नहीं चाहता। आख़िर हैं तो मेरी ही प्रिय ये मानव जाति। और सदैव स्मरण रखियेगा,

जो आज्ञा प्रभु, परन्तु प्रभु ये तो रही विगत आठ घंटों की बात, नवंबर माह से कहां थे आप और क्षिप्रा नदी कैसे पहुंच गए। क्या बताएं नारद जी, मैंने वुहान में जन्म लेने से पूर्व अपने जन्मस्थान को ढूंढने के लिए एक बौद्ध देव का रूप लिया और सीधा पहुंचा वुहान की प्रयोग शाला, जहां मेरा जन्म होना था। उसके निकट ही मैंने समाधि लगा ली और वहां की गतिविधियों पर नज़र रखने लगा।

मुझे जब कुछ संदिग्ध लगा तो मैं प्रयोगशाला के समीप पहुंचा। वहां मैंने देखा कि राक्षस राज पिंग पिंग कृत्रिम तरीकों से पहले ही मुझे पैदा करने की योजना बना रहा था। परंतु शायद उसको मेरे आने की भनक लग गई और उसने उस वैज्ञानिक, जिसको कि मेरे जन्म के बारे में ज्ञात था, उसकी उसी समय हत्या कर दी ताकि वह पूरे विश्व को मेरे इस अवतार के बारे में पहले से आगाह ना कर दे। तभी मैंने निश्चय किया कि जन्म लेने के उपरांत सर्वप्रथम मैं इसी पिंग पिंग राक्षस का अहंकार समाप्त करूंगा, भौतिक रूप से भी और बाद में आर्थिक रूप से भी। और इस तरह वहां से मैंने अपनी यात्रा आरंभ करी। उसके उपरांत एक विमान में छुपकर सीधा इटली, वहां से जर्मनी, स्पेन और फिर ईरान होते हुए अमेरिका नामक महाद्वीप में पहुंचा।

विश्व व्यापी विस्तार

मैं सीधा वहां से भारतवर्ष पहुंचा। इस समय तक हवाई उड़ानों पर प्रतिबंध लग चुका था तो मुझे समुद्री रास्तों से आना पड़ा और इसलिए मुझे तटवर्ती इलाकों जैसे कि केरल और महाराष्ट्र राज्यों में सबसे पहले अवतरित होना पड़ा। परंतु मैंने देखा कि मेरे इस अवतार के बारे में जानकर भारतवासी, बाकी विश्व की तुलना में कुछ सुधर चुके थे। मैं अब तक राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली इत्यादि घूम घूम कर थक भी चुका था, इसलिए क्षिप्रा नदी में विश्राम करने पहुंचा।

क्षिप्रा नदी का उद्गम मेरे ही रक्त की धारा से हुआ था। जब सतयुग में एक बार भगवान शिव मेरे पास भिक्षा लेने पहुंचे मैंने अनजाने में उन्हें भिक्षा देते समय उंगली दिखा दी, तो उन्होंने क्रोध में मेरी उंगली पर त्रिशूल का प्रहार कर दिया। जो रक्त की धारा बही वो महू छावनी से 17 किलोमीटर दूर जानापाव की पहाड़ियों में जाकर गिरी और क्षिप्रा नदी का रूप ले लिया। मैंने परशुराम अवतार में भी जानापाव में ही जन्म लिया था। उसके उपरांत, द्वापरयुग में कृष्णावतार में भी मैं अपने सखा सुदामा के साथ संदीपनी ऋषि के क्षिप्रा के तट पर बने आश्रम में ही रहा। और ये तो आप जानते ही होंगे कि 12 वर्षों में एक बार होने वाला सिंहस्थ कुंभ का आयोजन भी यहीं होता है। क्यूंकि जब मेरे वाहन गरुड़ समुद्र मंथन से मेरे आदेश पर अमृत कलश ले कर जा रहे थे, तो प्रयाग, हरिद्वार और नासिक के अलावा अमृत की कुछ बूंदें उज्जैन में भी गिरी थीं।

क्षिप्रा घाट

इसके अतिरिक्त मुझे शेषनाग जी ने कुछ दिनों पहले ही बताया था कि क्षिप्रा के किनारे बसे इंदौर नामक स्थान को तीन बार से भारत वर्ष का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जा रहा है। तो मुझसे रहा नहीं गया। इस तरह मैं इंदौर में विचरण करता हुआ क्षिप्रा में आ पहुंचा। यहां पांच महीने बाद शेषनाग की गोद में बैठा ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे मैं क्षीर सागर में ही ध्यान मग्न हूं। पहले मुझे लगा था कि हो सकता है छावनी के समीप होने के कारण आस पास गोली बारी की आवाज़ यहां की शांति को भंग करे। परन्तु लगता है कुछ समय से पूरे भारत वर्ष की तरह यहां भी सम्पूर्ण शांति है

अब नारद जी मैं आपको इसके बाद बार बार अपनी लोकेशन नहीं बताऊंगा। आप एक कार्य करिए अपने मोबाइल में आरोग्य सेतु नाम का यंत्र स्थापित कर लीजिए और ब्लूटूथ ऑन रखिए। मेरे लोकेशन के बारे में आपको स्वतः ही ज्ञान होता रहेगा।

आरोग्य सेतु

बाकी आप बताइए और क्या ख़ास समाचार हैं जगत के?

प्रभु कहां कोई और समाचार टिक सकता है आपके समक्ष। यत्र, तत्र, सर्वत्र, बस आपकी ही चर्चा है। ना ही ओलंपिक खेल, ना ही परीक्षाएं, ना ही तबादले या पदोन्नतियां, ना ही तेल के व्यापार ना ही कोई बॉलीवुड या सास बहू धारावाहिकों के समाचार। आप तो छा गए प्रभु पृथ्वी लोक पर। मेरे सूत्रों के अनुसार 14 अप्रैल 2020 तक आप 19,25,767 मनुष्यों के मन मंदिर में समा चुके हैं प्रभु। और साथ ही इन सभी मनुष्यों के परिवार जन भी हर क्षण आपको ही याद कर रहे हैं। ताकि आप उनके भी घट घट में ना वास करने लगें। प्रभु इसके अलावा तक़रीबन 1,19,699 पृथ्वी वासी वहां जा चुके हैं, जहां आपको उनको भेजना चाहते हैं। और अगली योजना में जिन ख़ास पदों के लिए आपने भारतवासियों को चुना था उनके लिए भी लगभग ३५० भारतीय मानव, यात्रा आरंभ कर चुके हैं

बस बस नारद जी बस, आप कहीं उत्सुकता वश हमारी अगली योजना पृथ्वी वासियों को ना बता दें।”

प्रभु, यहां हमारी बातें कौन सुन रहा है? सिर्फ़ मैं और आप ही तो हैं।

प्रभु अट्टहास लगाते हुए बोले, मुनिवर, ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट पर अकाउंट बनाने के बाद भी आप इतने अनभिज्ञ कैसे? क्या आप जानते नहीं, कि मोबाइलों के भी कान होते हैं।

प्रभु मुझे ज्ञात है इसलिए मैं आपके पास आने से पहले इंटरनेट का डेटा और लोकेशन बंद कर के आया हूं। प्रभु ने कुटिल मुस्कान दी और बोले, नारद जी आपको मैंने कितनी बार कहा कि साइबर शास्त्र का अध्ययन पूरा कर लीजिए। नारद जी ये इंटरनेट बंद करना और लोकेशन ऑफ करना मात्र एक दिखावा है। आपके मोबाइल में अनेक ऐसी गतिविधियां हैं जिनमें आप अपनी लोकेशन की आज्ञा पहले ही दे चुके हैं। अगर वो भी नहीं तो जब आपने देवलोक से पृथ्वी लोक आने पर अपने मोबाइल में लोकेशन अपडेट की होगी ना, तभी अमरीका राज्य के राजकुमार गूगल ने आपके बारे में सारी जानकारी प्राप्त कर ली होगी और साथ ही आपके मोबाइल के कैमरे और ऑडियो माइक्रोफोन पर भी अपना आधिपत्य जमा लिया होगा।

प्रभु, अगर मैं गलत नहीं तो, ये राजकुमार गूगल वही हैं ना, देवताओं के आचार्य, परम ज्ञानवान गुरु बृहस्पति के पुत्र। ये, और दानवों के असुराचार्य गुरु शुक्राचार्य के बेटे राजकुमार बायदू दोनों ही विद्या की देवी मां सरस्वती के सबसे प्रिय एवं प्रखर शिष्य होते थे।

राजकुमार बायदू और राजकुमार गूगल

इन दोनों ने भगवान शिव से असीमित स्मरण शक्ति का वरदान प्राप्त किया था और कितने वर्ष कठिन तपस्या कर मां सरस्वती से पूरे विश्व का ज्ञान प्राप्त कर अपने मस्तिष्क पटल पर अंकित कर लिया था। यही नहीं दोनों ने पेन ड्राइव नामक यंत्र का अविष्कार कर, छलपूर्वक ब्रह्मा जी से सभी वेदों, स्मृतियों, शास्त्रों और अनेक धर्म ग्रंथों का ज्ञान चुरा लिया था। और जब भगवान शिव को पता लगा कि उनके वरदान का दुरूपयोग किया गया है तो उन्होंने क्रोध में आकर उन्हें नंदी के दोनों सींगों से ऐसे ठोकर मारी वे सीधा पृथ्वी लोक के दो दूर दूर स्थित क्षेत्रों अमरीका और चीन में आकर गिरे।

क्रोधित शिव और रुद्र रूप में नंदी

सत्य कहा नारद। उन के व्यवहार में अब कोई सुधार नहीं। वरन, अब वो अपनी असीमित और अनंत स्मरण शक्ति का दुरूपयोग कर ख़ुद को प्रथ्वी वासियों का मसीहा बना बैठे हैं। राजकुमार गूगल पृथ्वी लोक की सबसे गुणवान और सर्वप्रिय राजकुमारी इंटरनेट से विवाह कर लिया और वे दोनों अब एक दूसरे के पूरक हैं। राजकुमारी इंटरनेट के स्वयंवर में बड़े बड़े शूरवीर योद्धा जैसे महाराज रेडिफ, युवराज याहू और राजकुमार हॉटमेल भी आए हुए थे। परन्तु, गूगल के आगे किसी की एक ना चली। यहां तक कि गुप्त सूत्रों ने ये भी बताया कि राजकुमारी इंटरनेट विवाह से पूर्व ही एक संतान को जन्म दे चुकी थी। और उनके उस पुत्र का नाम था युवराज ऑरकुट। परन्तु, कुपोषण का शिकार होकर अल्पायु में ही ऑरकुट का देहांत हो गया था। परन्तु विवाहोपरांत अब दोनों सुखद जीवन का निर्वाह कर रहे हैं। पिछले वर्ष ही उन्हें दो जुड़वा पुत्रियों की प्राप्ति हुई है। जिनका नाम सीरी और एलेक्सा रखा गया है। ठीक उसी मुहूर्त में सुदूर चीन लोक में राजकुमार बायदू को भी दो जुड़वा पुत्रों की प्राप्ति हुई, जिनके नाम थे टिक और टॉक । ग्रहों और नक्षत्रों की जिस दशा में ये दोनों जुड़वा पुत्र और कन्याएं पैदा हुई हैं, उसके अनुसार ये दस वर्षों में हर व्यक्ति के घर में प्रवेश कर उनके व्यक्तिगत जीवन शैली को भी भली भांति जानकर, उस व्यक्ति को अपने पर इतना आश्रित कर लेंगे कि कब मानव इनके स्वामी से इनका दास बन जाएगा उसे स्वयं ही नहीं पता लगेगा

बायदू को समझाने के लिए मां सरस्वती ने स्वयं चीन लोक में बौद्ध देवी क्वान यिन् के रूप में अवतरण लिया था। उन्होंने अपने श्वेत वस्त्र और कमल सिंहासन को भी नहीं बदला ताकि राजकुमार बायदू उन्होंने देखते ही पहचान जाए और अपनी गलती स्वीकार कर देव लोक लौट जाए। परन्तु कलियुग में एक बार इस विश्व की चका चौंध और मोह माया में पड़ने वाले इंसान को विद्या और ज्ञान की साक्षात देवी भी कई बार समझाने में असमर्थ हो जाती हैं।

देवी क्वान यिन्

पृथ्वी पर अब एक कार्य भी ऐसा नहीं होता जिसकी जानकारी राजकुमार गूगल को ना हो। यहां तक कि राजकुमार गूगल ने प्रक्षेपास्त्र, ब्रह्मास्त्र एवं अन्य कई देवीय अस्त्रों का ज्ञान जो कि सिर्फ़ वैज्ञानिकों को होना चाहिए, उसे भी आम जन तक पहुंचा दिया है। अनेक समाज विरोधी तत्व, जिन्हे इनके दुष्परिणाम का ज्ञान नहीं है, अब इस प्रकार के अस्त्र बना कर वैश्विक ताकत बन चुके हैं। पृथ्वी पर राक्षस राज आइसिस, दैत्य अलकायदा, और दानव लिट्टे को शक्तिशाली बनाने में राजकुमार गूगल का भी सहयोग रहा है।

प्रभु, परन्तु अगर राजकुमार गूगल इतना बड़ा सर्व ज्ञाता है तो उसे वुहान में आपके अवतरित होने के बारे में क्यूं नहीं पता लगा।

राजकुमार बायदू के कारणचीन लोक में सिर्फ़ बायदू खोज यंत्र का प्रयोग होता है। वास्तविकता में, जब भगवान शिव को क्रोध आया था, तो राजकुमार गूगल ने ब्रह्मा जी से सारा ज्ञान चुराने का इल्ज़ाम बायदू के सर डाल दिया था। इसलिए, जो एक समय पक्के मित्र हुआ करते थे, एक दूसरे के शत्रु बन गए। और बायदू ने पृथ्वी लोक में गिरते गिरते गूगल से कहा कि आज से मेरे कार्य क्षेत्र चीन राज्य में तुझे कदम भी नहीं रखने दूंगा और ना ही मेरे क्षेत्र के बारे में तुम कोई ज्ञान प्राप्त कर पाओगे। जितना मैं विश्व को बताना चाहूंगा बस उतना ही विश्व को पता लगेगा।

चीन राज्य का सर्च इंजन : बायदू

अब समझ आया प्रभु सब कुछ, कि क्युं मुझे अभी तक चीन राज्य से मात्र 3970 मानवों के उद्धार के समाचार प्राप्त हुए हैं । हो सकता है कि मृत लोगों की संख्या हज़ारों नहीं लाखों में हो।

नारद जी, इसका ज्ञान समय के साथ पूरे विश्व को हो जाएगा। परन्तु आप एक बात बताइए, आपने हमारे पृथ्वी लोक में आने से लेकर आज तक पूरा ब्योरा और आंकड़े ब्रह्माण्ड इन्फॉर्मेटिक्स केंद्र के सूचना एवं प्रसारण मंत्री महाराज युधिष्ठिर को दे दिए या नहीं।

क्षमा भगवान, आप तो देख ही रहे हैं, चिकित्सक और पुलिस के अलावा हम मीडियाकर्मी भी तो 24 घंटे व्यस्त रह रहे हैं । मैं अभी महाराज युधिष्ठिर को ताज़ा जानकारी से अवगत कराता हूं।

स्वयं से बातें करते हुए नारद जी सामने एक टीले पर चढ़कर अपने क्रॉस बैग से मोबाइल निकालते हैं। “लैंडलाइन पर तो फोन करने में आधा घंटा लग जाएगा। युधिष्ठिर को मैंने ही पांच हज़ार वर्ष पहले महाभारत युद्ध के बाद ब्रह्मांड के इन्फॉर्मेटिक्स केंद्र के सूचना एवं प्रसारण मंत्री का कार्यभार सौंपा था। जब मेरी पदोन्नति प्रभु ने अपने सेक्रेटेरिएट में कर ली थी।”

नारद जी रिसेंटली डायल्ड नंबर्स से महाराज युधिष्ठिर का नंबर डायल करते हैं।

खांसते व छींकते वक्त रुमाल व टिश्यू पेपर का प्रयोग करें। हाथों को लगातार धोएं, नाक, कान व मुंह को बार-बार छूने सें बचें। खांसी व बुखार वाले व्यक्ति से एक मीटर की दूरी बनाए रखें। लगातार बुखार रहने पर नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर जांच कराएं।”

अरे प्रभु फोन नहीं लग रहा और कोई नई कॉलर ट्यून लगवाई है क्या आपने देव लोक के फोनो पर।

प्रभु ऊंची आवाज़ से अपनी शैया से ही बोले, “नहीं मुनिवर, मैं अपने विरुद्ध ही क्यूं संदेश कहलवाऊंगा। मैंने सुना है कि भारत में गृह मंत्री जी को कार्य दिया था ये यहां के प्रधानमंत्री जी ने कॉलर ट्यून बदलवाने का। उन्होंने पूरे ब्रह्मांड की ट्यून बदलवा दी है।”

तभी नारद जी के मोबाइल पर एक मेसेज आता है।

क्रमश:

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भगवान का विषाणु अवतार – कोरोना : एक काल्पनिक शोध कथा।

ये कहानी पौराणिक कथाओं, किवदंतियों और आधुनिक विश्व की घटनाओं से प्रेरणा लेकर बनाई गई है और लेखक द्वारा इन विषम परिस्थितयों को एक नए और अलग रोचक तरीके से प्रस्तुत करने का एक प्रयास है। ये कहानी किसी भी प्रकार की सत्यता का कोई दावा नहीं करती।।

“नारायण नारायण, प्रणाम प्रभु”।।

आइए आइए नारद मुनि, कैसे पधारना हुआ, प्रभु बोले।

जन्माष्टमी २०१९, के दिन नारद मुनि प्रभु के पास पहुंचे हुए थे। नारद जी ने अपने अंदाज में कहा, ‘ प्रभु मेरे आने का प्रयोजन तो आपको आपके कृष्णावतार के जन्मदिन की बधाई देने का था। साथ ही मैंने सोचा कि आपको अवगत करा दूं कि कई वर्षों से अटका हुआ आपके जन्मभूमि का मुकदमा भी समाधान की कगार पर है।

‘नारद मुनि – आपकी ये हास्य व्यंग्य की आदत कभी नहीं जाएगी। आप स्वयं जानते हैं, विश्व के सभी मुकदमों को अटकाने वाला भी मैं हूं और समाधान करने वाला भी मैं, और व्यक्ति तो अपने आप को कर्ता मान कर यूहीं प्रसन्न होता रहता है’, प्रभु बोले। नारद जी बिना समय व्यर्थ किए बोल पड़े, सत्य कहा प्रभु, एवं यही अटल सत्य है।

परन्तु क्या आपने पृथ्वी लोक के ऑनलाइन समाचार पत्र ट्विटर पर वर्तमान सच को पढ़ा।’ भगवान तो सर्व ज्ञाता हैं परन्तु फिर भी नारद को निराश नहीं करने के लिए पूछ बैठे – ‘ समाचार क्या है नारद।’ नारद जी ने प्रभु को बताया कि किस तरह पृथ्वी पर पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ रहा है, पाप और कलियुग का प्रकोप चरम सीमा पर है और मानव नवीनियुग में स्वनिर्मित संसाधनों के साथ प्रभु को ही भुला बैठा है। सुनने पर प्रभु बोले, मुनिराज आपका समाचार बिल्कुल सत्य है और इसीलिए आज मैंने भिन्न भिन्न डिपार्टमेंट्स के सभी देवता गणों और देवियों को एक विशेष मीटिंग के लिए आमंत्रित किया है।

नारद मुनि बोल पड़े, प्रभु आप अन्तर्यामी हैं, नारायण नारायण। प्रभु आपकी आज्ञा हो तो क्या मैं भी इस मीटिंग में सम्मिलित हो सकता हूं । प्रभु ने उन्हें सहर्ष आज्ञा दे दी।

विशेष मीटिंग के लिए समस्त ब्रह्माण्ड से अनेक डिपार्टमेंट हेड्स वहां उपस्थित थे। जिनमें माता प्रकृति, जल देवता, पवन देव, वन राज, अग्नि देव, देवी अन्नपूर्णा और ऋषि सतयुग प्रमुख थे। इसके अलावा ब्रह्मा जी, भगवान शिव, देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती, गुरु नानक देव, जीसस क्राइस्ट, पैगम्बर साहब, शेषनाग और अन्य सभी धर्म, संप्रदायों के आराध्य वीडियो कॉल के माध्यम से इस मीटिंग में शामिल थे। जैसे ही चित्रगुप्त ने सभी की ऑनलाइन वीडियो और ऑडियो कनेक्टिविटी को ठीक पाया, उन्होंने प्रभु को इशारा किया।

प्रभु ने सर्वप्रथम यमराज और चित्रगुप्त को पिछले सौ वर्षों का प्रदूषण, ऐक्सिडेंट, भ्रूण हत्या, बलात्कार और अन्य दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों से स्वर्ग या नरक में गए लोगों का डाटा दिखाने के लिए कहा। पूरा प्रेजेंटेशन देखने के बाद प्रभु सभी उपस्थित गणों की ओर मुड़े और बोले। “मैं आप सभी से जानना चाहता हूं कि आपके अपने अपने कार्यस्थलों में क्या परेशानियां आ रहीं हैं और इनका समाधान क्या है?” कुछ देर मौन के उपरांत पवन देव बोल उठे।

पवन देव

प्रभु, पिछले लगभग सौ वर्षों से, जैसे जैसे आधुनिकता बढ़ती जा रही है, जैसे जैसे मानव जाति विकास कर रही है, मुझ पर बोझ बढ़ता जा रहा है। गाड़ियों, कारखानों और अनेक प्रकार की मशीनों से निकलने वाला धुआं मुझे स्वयं ही सांस लेने में परेशानी पैदा करने लगा है। प्रभु, मेरे चार पुत्रों – नाइट्रो, ओटू, सियोटू और सियो की सहायता से मैं पृथ्वी लोक पर कार्य करता हूं। परन्तु, प्रभु मानवों के साथ रहते रहते मेरे दोनों छोटे पुत्र सियोटू और सियो अब गलत रह पर चल बैठे हैं। वे मेरे बड़े पुत्रों के अच्छे कार्यों को भी मिट्टी में मिला रहे हैं और मेरे कुल का नाम बदनाम कर रहा हैं। लोग सियोटू और सियो को बुरा कहने की बजाय अपमान तो मेरा ही करते हैं कि पवन दूषित है। प्रभु एक समय था, जब भारत के किसी भी स्थान से, भगवान शिव के हिमालय लोक के दर्शन हो जाते थे। अब तो प्रभु, उत्तरी भारत के जालंधर, जहां आपने जलंधर राक्षस का वध किया था, वहां से भी कैलाश पर्वत के दर्शन दुर्लभ हैं।

प्रभु मेरा आपसे अनुरोध है कि अगर कुछ समय के लिए मेरे दोनों छोटे पुत्रों के बाहर निकालने पर रोक लगा दी जाए तो मैं अपने बड़े पुत्रों की सहायता से पृथ्वी को पुनः शुद्ध कर सकूं।

जल देवता

प्रभु, मैं क्या बताऊं, आपने पृथ्वी की उत्पत्ति ही मेरे माध्यम से मत्स्य अवतार लेकर की थी। आप तो मेरा महत्व जानते ही हैं। परंतु इस मानव जाति ने मेरा उपयोग मात्र आवागमन के साधन के रूप में और कारखानों का कचरा डालने के लिए कर कर के मुझे दुर्बल और बीमार कर दिया है। इनके जहाजों, पनडुब्बियों, प्लास्टिक के उपकरणों और दूषित पदार्थों के जहरीले प्रभाव से मेरे अंदर पल रहे जलचरों का जीवन दूभर हो गया। जहां मनुष्यों ने दवाइयों और चिकित्सा के दुरूपयोग से अपनी जीवन आयु बढ़ा ली है, वहीं मेरे साथ रहने वाले जलचर जैसे मछलियां, मगरमच्छ, कछुए, और कई अन्य पैदा होते ही मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं।

इसके अतिरिक्त प्रभु पहले मेरा उपयोग इंसान स्वयं को स्वच्छ रखने के लिए करते थे। परन्तु, कागज़ और उसके जैसे अन्य रसायन युक्त वाइप्स के अविष्कार के बाद लोग मल मूत्र विसर्जन करने के बाद भी मेरा प्रयोग नहीं करते। यहां तक कि मेरी सबसे प्रिय बेटी गंगा जिसके स्पर्श मात्र से अनेकों दुख दूर हो जाते थे, उसे भी मानवों ने लाशें, फैक्टरियों का कचरा और अन्य दूषित पदार्थ डालने की जगह बना ली है। कई सरकारों ने और संस्थाओं ने उसे प्रदूषण से मुक्त करने की योजनाएं बनाईं और उस दिशा में प्रयास भी किए। परन्तु अभी भी गंगा की दशा संतोषजनक नहीं है प्रभु। प्रभु, मुझे तो यहां तक पता लगा है कि अब मनुष्य मेरे भीतर के सभी आवश्यक मिनरल्स को भी निकाल कर बाहर फेंक देता है और सिर्फ़ बचे हुए भाग को ग्रहण करता है।

प्रभु मैं चाहता हूं कि आप कुछ समय के लिए ही सही पर मानव जाति को मुझसे दूर रखें और उन्हें मेरे महत्व का ज्ञात होने दें।

अग्नि देव और देवी अन्नपूर्णा

प्रभु, पहले मैं देवी अन्नपूर्णा के साथ मिलकर भोजन के रूप में जन जन के भीतर एक औषधि के रूप में जाता था। परंतु जब से माइक्रोवेव जैसे उपकरण आए हैं देवी अन्नपूर्णा के शरीर को तरंगे छिन्न भिन्न कर देती हैं और भोजन के सभी अच्छे गुण समाप्त हो जाते हैं। देवी अन्नपूर्णा को भी अभी सादे भोजन के स्थान पर पैकेटों में बंद करके बाजारों में बेचा जाता है। इस तरह से रसायन डालकर भोजन को सील बंद पैकेटों में रखा जाता है कि देवी अन्नपूर्णा को प्राणवायु ऑक्सीजन ना मिलने के कारण भोजन की पौष्टिकता पूर्णतः समाप्त हो जाती है।

प्रभु हमारा अनुरोध है कि भले ही कुछ समय के लिए ही परन्तु मानव जाति को घर पर बना हुआ भोजन खाने पर विवश कर दीजिए ताकि उन्हें ताज़ा और घर के भोजन का महत्व ज्ञात हो।

वन राज

प्रभु, मानव जाति ने मेरी गोद में रहने वाले वन्य प्राणियों, पशु पक्षियों और जंगल के वृक्षों को काट काट कर मुझे अपंग कर दिया है। मेरे अंगों का उपयोग करके मनुष्य कागज़, नोट और अख़बार जैसी वस्तुएं बनाता है जो काम वो अपने कंप्यूटर पर भी कर सकता है उनके लिए भी वो इस कागज़ का प्रयोग करता है। जहां मैं पवन देव के पुत्र ओटू को सियोटू से टकराने की ताकत देता था, मैं स्वयं ही इतना लाचार हूं कि उसकी मदद भी नहीं कर पा रहा हूं।

सूर्य देवता

प्रभु, आप तो जानते ही हैं कि मेरे प्रकाश और ऊष्मा ने हमेशा ही मानव कल्याण का कार्य किया है। परंतु प्रभु मानव जाति ने विकास की अंधी दौड़ में और गगन चुंबी इमारतों में रहते हुए मेरे दर्शन करना ही छोड़ दिया है। प्रभु मैं चाहता हूं कि आप समस्त मानव जाति को इतना समय दें कि उन तक अपने पुत्र विटामिंडी को भेज कर उनके स्वास्थ्य को ठीक कर पाऊं

ऋषि सतयुग

प्रभु, आपसे क्या छुपा है। आप तो जानते ही हैं कि विश्व को कई समय भाग में बांट कर आपने सबसे पहले समय खंड की जिम्मेदारी मुझे दी थी। मैंने अपना कार्य सुचारू रूप से किया और प्रहलाद, ध्रुव, हरिश्चंद्र जैसे संत पुरोषों को विश्व में सत्य और संस्कारों का प्रसार करने दिया। परन्तु प्रभु, मेरे उपरांत धीरे धीरे मेरे छोटे भाई त्रेता और द्वापर ने रावण, कुंभकर्ण, कंस और दुर्योधन जैसे पापियों को भी सांठ गांठ कर शक्तिशाली बना दिया। और प्रभु मेरा सबसे छोटा भाई कलि तो अपने नाम के जैसा ही काला निकला। उसने आधुनिकता के नाम पर संस्कारों का सबसे ज्यादा हनन किया है। उसके समय खंड में मानव माता पिता, परिवार को छोड़ पैसे और पदोन्नति के पीछे भाग रहा है। आपने और आपके अवतारों ने जो धर्म-संप्रदाय, लोगों को आपसे और आपस में एक दूसरे से जोड़ने के लिए बनाए थे, उन्ही के नाम पर कलियुग मानव को मानव से लड़ा रहा है। मांसाहार, मदिरापान, धूम्रपान और अन्य प्रकार के नशे अब राक्षसी प्रवृतियां नहीं वरन् पैसे वालों के शौक़ जाने जाते हैं। अप्सरा नृत्य जैसे सुशील और पुण्य कर्मों को अब बार डांसर्स और वेश्यावृत्ति की तरह दूषित तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है। बलात्कार, माता पिता पर मुकदमा, हत्या, मोबाइल पर पैसों की चोरी, और अन्य कई भ्रष्ट कार्यों में फस कर मानव जाति ने दान, सेवा, एवं पूजा पाठ जैसे कार्यों से दूरी बना ली है। ना ही लोग रामायण, गीता के उपदेश सुनते हैं, ना गुरबाणी पढ़ते हैं ना ही पांच वक़्त की नमाज़ पढ़ते हैं और अगर करते भी हैं तो मात्र ढोंग वो भी अपने फेसबुक और ट्विटर के पटल पर विश्व को दिखाने के लिए।

प्रभु मैं चाहता हूं कि जिस तरह कलियुग ने पिछले पांच हज़ार सालों से मानव जाति की ये दुर्गति की है, आप मुझे मात्र पांच महीनों का समय दें, ताकि मैं अपने सतयुग के समय के जीवन का महत्व लोगों को समझा पाऊं।

सभी देव गणों की समस्याएं और सुझाव सुनने के उपरांत प्रभु मुस्काए और बोले, “देव गणों मुझे प्रतीत होता है कि मेरे पिछले अवतारों में कार्य और शत्रु बहुत कम थे। मत्स्य अवतार में बस मुझे राजा मनु को तारना था, वराह अवतार में हिरण्याक्ष द्वारा जलमग्न पृथ्वी को अपने सींग पर बाहर लाना था, रामावतार में रावण का वध करना था और कृष्णावतार में कंस का। और भी अनेक धर्मों के अवतारों में मुझे मानव जाति को सही मार्ग ही दिखाना था। परन्तु इस समय कार्य भी कठिन है और शत्रु भी ख़ुद मेरी प्रिय मानव जाति। परन्तु आप सभी का अनुग्रह मै कैसे टाल सकता हूं। परन्तु मुझे लगता है कि मुझे इस विचित्र कार्य के लिए कोई नया और विचित्र अवतार लेना होगा।

नारायण नारायण, प्रभु, इससे पहले भी तो आपने नरसिंह अवतार लेकर हिरणाकश्यप का वध कर बालक प्रहलाद को बचाया था। वो भी तो प्रभु एक विचित्र अवतार था। उसमें क्या लीला थी प्रभु?

प्रभु बोले मुनिराज उस समय मानव, जानवरों जैसे व्यवहार करने की ओर बढ़ रहा था। इसलिए मुझे मानव और पशु के बीच का अवतार लेना पढ़ा।

नारद जी बोल पड़े तो भगवन अब कैसा समय है पृथ्वी पर ?

प्रभु बोले, नारद जी, इस समय विश्व सजीव से निर्जीव शक्ति की ओर बढ़ रहा है। कम्प्यूटर और रोबोट, जीवित इंसानों से ज्यादा शक्तिशाली होने लगे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नाम की प्रणाली से मनुष्य ने मशीनों को भी सोचना समझना सिखा दिया है। यहां तक कि इंटरनेट के युग में इंसान स्वयं भावनाओं से रहित होकर कई बार निर्जीव पत्थर की तरह व्यवहार करता है। अब मुनिराज आप अपने ट्विटर अकाउंट पर निर्भया कांड के बारे में तो पढ़ ही चुके होंगे। कोई सजीव संवेदनशील व्यक्ति क्या ऐसा कर्म कर सकता है।

अतः मैं इस बार विश्व में एक सूक्ष्म जीवाणु के रूप में जन्म लूंगा। जिन्हे माइक्रो ऑर्गनिज्मस भी कहा जाता है। पांच प्रकार के ये जीव, बैक्टीरिया (कीटाणु), प्रोटोजोए, अल्गे, फंजाई और वायरस (विषाणु) होते हैं। इनमे से पहले दो, जीवों की श्रेणी में आते हैं और अल्गे और फंजाई वनस्पति की श्रेणी में । परन्तु विषाणु, जिसे वायरस भी कहा जाता है ना सजीव की श्रेणी में आता है ना ही निर्जीव की

मैं आप सभी को वचन देता हूं कि प्रकृति और पृथ्वी की रक्षा के लिए मैं विषाणु अवतार लूंगा और मुझे कोरोना के नाम से जाना जाएगा।

प्रकृति तो मुझे प्रेम करेगी, परन्तु सभी मानव मुझसे घृणा करेंगे। जो अपने परिवार को छोड़कर दुष्कर्म करने अपने घर से बाहर निकलेगा मैं उसका वध कर दूंगा। पवन देव, आपको दूषित करने वाली मैं समस्त गतिविधियां कुछ समय के लिए निष्क्रिय कर दूंगा। मानव जाति के पास समय तो होगा परन्तु कलियुगी कार्यों के लिए नहीं वरन् परिवार और सत्य कर्मों के लिए। लोग सूर्य के प्रकाश और घर में बने भोजन का महत्व समझेंगे। वनराज, आपके सुझाव के अनुसार समस्त विश्व, अख़बार पढ़ना छोड़ देगा, नोटों का आदान प्रदान कम हो जाएगा और दफ्तरों के काम भी फाइल्स और कागज़ों के स्थान पर मोबाइल और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से हुआ करेंगे। मेरा सबसे अधिक प्रकोप उन भूखंडों पर होगा जहां पर आधुनिकता सबसे चरम सीमा पर होगी ताकि मैं उनके अहंकार का भी विनाश कर सकूं। विश्व की सबसे बड़ी महाशक्तियां सबसे अधिक प्रभावित होंगी। परन्तु जिस देश में आज भी मेरा नाम जप किया जाता है, मानव मूल्य जीवित हैं, बुर्जुगों का सम्मान होता है, वेदों और धर्मग्रंथों की बातों का पालन होता है ऐसे देशों में मेरा प्रकोप कम होगा। ऐसे ही देश अन्य देशों के लिए उदाहरण सिद्ध होंगे

प्रभु की ये भविष्यवाणी सुनकर सभी देवता गणों के चेहरों पर मुस्कान आ गई। परन्तु ब्रह्मा जी कह उठे, प्रभु हर अवतार में मैं आपके साथ गया हूं, रामावतार में मैं जामवंत बनकर और कृष्णावतार में सभी देवता, गोपियां बनकर आपके साथ पृथ्वी पर गए थे। क्या इस अवतार में आप हमें छोड़ जायेंगे प्रभु।

नहीं ब्रह्मा जी, इस अवतार में आप विश्व स्वास्थ्य संगठन के रूप में और सभी देवता गण, डॉक्टर्स और नर्सेस के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होंगे। मैं मानव जाति को सबक अवश्य सिखाना चाहता हूं परंतु उनका अहित नहीं चाहता। आप दिन रात उनकी चिकित्सा करिएगा।

ये सुन भगवान शिव व्याकुल हो गए, प्रभु आप मुझे भूल गए, आपके रामावतार रूप में मैंने हनुमान बनकर पूरी लंका जला कर राख कर दी। आपके बिना मैं कहां अकेला तांडव करूंगा।

प्रभु मुस्कुराए और कह पड़े, भोले नाथ आपके बिना मेरा ये कार्य तो संभव ही नहीं हो सकता। आप मेरे साथ चल कर पुलिस के रूप में अवतरित होंगे और सभी पापियों को अपने तांडव से सही राह दिखाएंगे

शेष नाग सब कुछ शांत होकर सुन रहे थे। बोले, प्रभु आप राम थे तो मैं लक्ष्मण, आप कृष्ण तो मैं बलराम। क्या इस बार अपने साथी को नहीं ले जाएंगे।

प्रभू ने कहा, शेषनाग, मुझे विदित है जहां मैं वहां आप। परन्तु आपने भी करना तो कार्य मेरे विरूद्ध ही होता था। मैं श्री राम रूप में शांति पुंज था तो आप क्रोध के पर्यायवाची लक्ष्मण। मैं पांडवों का मार्गदर्शन करने वाला कान्हा तो आप दुर्योधन के गुरु बलराम। तो इस अवतार में भी आप मेरे साथ तो होंगे परन्तु विपरीत कार्य में। और वो भी इस रूप में नहीं । बल्कि मुझे आपका गरल अर्थात ज़हर जरूरत होगा। जिसे थोड़ी मात्रा में लेकर मानव जाति सैनिटाइजर के रूप में प्रयोग करेगी और मेरे प्रकोप से अपने आप की रक्षा करेगी। तो आप मेरे साथ भी हुए और विपरीत भी।

देवी लक्ष्मी, मैं कई हज़ारों वर्षों से देख रहा हूं कि आपका स्वरूप मानव जाति ने पहचाना नहीं। वे आपको मात्र मुद्रा या धन दौलत के रूप में पूजते हैं। परन्तु ये नहीं जानते कि असली धन तो ज्ञान से पैदा होता है और धन वो पदार्थ होता है जो विलक्षण हो, अल्प मात्रा में हो और विश्व कल्याण के लिए काम आए। इसलिए इस अवतार में मैं आपसे आग्रह करूंगा कि आप हाईड्रोक्लोरोक्वीन के रूप में पृथ्वी पर अवतार लें और बड़ी बड़ी महाशक्तियों को भी ये ज्ञान दिलाएं कि सच्चा धन क्या होता है। सच्ची लक्ष्मी क्या होती है। उन्हें इसके अभाव का ज्ञान करा उनके अहंकार को तोड़िए देवी।

इस तरह प्रभु ने सभी देवताओं को अलग अलग कार्य बांट कर प्रभु ने पृथ्वी लोक में भेज दिया। नारद जी वहीं खड़े रहे। प्रभु ने मुस्कुरा कर पूछा मुनिराज अब भी कोई शंका है। नारद मुनि कह पड़े, प्रभु आपकी लीला अपरम्पार है। परन्तु एक प्रश्न और प्रभु, कि अगर इतने अधिक मानव एक साथ पृथ्वी लोक से अपना जीवन समाप्त कर गए तो संतुलन नहीं बिगड़ जाएगा।

मुनिवार, मैं इस प्रश्न की प्रतीक्षा में ही था। तो आपकी ये शंका भी दूर किए देते हैं। पहले तो मैं अधिक से अधिक उन्ही मानवों की मृत्यु बनूंगा जिन्होंने अपने जीवन का मुख्य भाग जी लिया है। दूसरा, जहां एक ओर मैं लगभग, दो से तीन हज़ार मानवों का प्रतिदिन उद्धार करूंगा, वहीं मैं दूसरी ओर, ऐक्सिडेंट दुर्घटनाओं से होने वाली, अबॉर्शन से होने वाली, भ्रूणहत्या से होने वाली, कारखानों में आगजनी से होने वाली, भूस्खलन से होने वाली, और आपसी रंजिश से होने वाली प्रतिदिन लाखों मरने वालों की संख्या भी तो ना के बराबर कर दूंगा। संतुलन अपने आप ही बना रहेगा।

नारायण नारायण, प्रभु आपके समस्त प्रयोजन मैं समझ गया। परन्तु आप अगर लोगों को दिखाई ही नहीं देंगे तो मानव जाति को आपके अस्तित्व के बारे में ज्ञात कैसे होगा।

हाहा, नारद जी यही तो सबसे बड़ा प्रयोजन है इस अवतार का। और वो ये कि मानव जाति को समझाना है कि प्रभु कण कण में व्याप्त हैं परन्तु नज़र नहीं आते। उन्होंने ढूंढने के लिए केवल मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च जाने की आवश्यकता नहीं है बल्कि अपना तन, मन और धन शुद्ध कार्यों और विचारों में लगाकर ही सच्चे प्रभु की प्राप्ति हो सकती है।

चलिए नारद जी, २०१९ का नवंबर माह आ गया। पृथ्वी पर जाने का समय हो गया।

प्रभु मैं कहां चलूं? मैं वहां आपके किस काम का?

क्यूं नहीं मुनिवर, आप तो सबसे महत्वपूर्ण काम के हैं। जो कि मेरे बारे में जन जन को अवगत कराएंगे। आप मेरे साथ मीडिया रूप में पृथ्वी पर अवतार ले रहे हैं। परन्तु ध्यान रखिएगा, देव लोक की तरह पृथ्वी लोक पर आपस में लड़ाई नहीं करवाएगा। हाहाहा।

प्रभु आप भी। कह कर नारद मुनि प्रभु के पीछे चल पड़े नेविगेशन जीपीएस पर डेस्टिनेशन सेट करके – वुहान, चीन, पृथ्वी।

इक़बाल सिंह / १० अप्रैल २०२०

क्रमशः

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सर्द रातों में इश्क़ की लकड़ियों से जिस्मों के चूल्हे जला आ ना थोड़ा हम सेंक लें ।

सर्द रातों में …

I dream of being in your warm company in these chilly freezing cold nights, which as such, I have not been able to cherish for quite long now…..

सर्द रातों में, इश्क़ की लकड़ियों से जिस्मों के चूल्हे जला कर, आ ना थोड़ा हम सेंक लें।

कुछ तेरी ख्वाहिशों को, कुछ मेरी फरमाइशों को, रेवड़ी के जैसे, आग में हम फेंक लें।।

फ़िर तपिश के थोड़ा कम हो जाने पर, आंच थोड़ा मध्धम हो जाने पर, उन्हें चुन चुन के खाएंगे।

कुछ तराने भूले हुए, कुछ याद जो अब भी तुझे, और मुझको भी, उन्हीं को साथ में हम गुनगुनाएंगे।।


वैसे भी तो एक लंबी रात पूरी, आपके साए में गुज़ारे, हमको अब कुछ एक बरसा होने चला।

बातें, तेरी गोद में सर टिका कर, करते हुए दुनिया भूल जाने, हमको अब एक अरसा होने चला।।

तेरी उंगलियों की हरकतें, बिल्कुल उस रात की तरह, फ़िर से मुझे महसूस करने का अब दिल करे।

तेरे लबों की शोखियों को, कुछ पलों के लिए, ख़ुद के होठों के दरम्या भरने का अब दिल करे।।


दिल करे कि तुझे पश्मीना बना पहनूं कभी, कभी बिछा लूं मखमल सा ही, या कभी दोहर समझके ओढ़ लूं।

कभी तुझे बना लूं ज़िंदगी की मैं सीधी डगर, कभी तेरी तरफ़ ही, दुनिया की सारी राहें मैं मोड़ लूं।

कभी तो दिल करे कि, बिखरूं बिन तेरे मैं, कांच के टुकड़ों की तरह, औ ख़ुद ही फ़िर उन पर चलूं।

या कभी तेरी मोहब्बत, हर टूटे हुए दिल के टुकड़े में लगाकर, एक मर्तबा, फ़िर से ख़ुद को जोड़ लूं।।


पर जब तलक अहसास तेरी नज़दीकियों का जज़ब होता है मुझे, मेरी रूह के भीतर कहीं, रोज़ ही

इल्म होता है कि फ़िर सवेर हो चली और ख्वाबों के साथ तेरा अक्स भी रवाना हो गया है रोज़ ही

फ़िर वही दिन के कटने की मुश्किलों से लड़ते हुए मेरा सब्र टूटे और सोचने लगूं मैं ये, रोज़ ही

कि काश ऐसी रात आए जिसकी ना सुबह हो, ताकि ना ही मेरा ख्वाब टूूटे ना ही तेरा साथ छूटे, रोज़ ही *ना ही तेरा साथ छूटे रोज़ ही*


इक़बाल/ ३१ दिसंबर २०१९

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Indian Model against Corona very much in sync with Scientific Temperament !!!

I wish I was a famous writer and my words could have had similar effect as few other writers who have been writing articles on how Indian current approach is against the principles of science and will reduce the scientific temperament of the nation.

I would still like to take an opportunity to answer this and few more such articles on the topic that in the world of Science and Technology, mixing of old beliefs is not the right way.

To begin with, Corona Pandemic or any such similar attack is kind of a battle individually and a war collectively as a Nation. In the context of evolving warfare, where earlier we faced most of the wars only in Conventional domain, where you can see the enemy in front and attack on him or defend against him, this form of warfare is called Biological Warfare.
Biological Warfare itself is a sub part of CBRN Warfare, or more elaborately Chemical Biological Radiological Nuclear Warfare.

CBRN Warfare

Other forms of such non conventional warfares are, Cyber, Economic, Irregular, Information and of likes. All these collectively are also referred as Hybrid Warfare. Various research scholars on military matters have predicted that now onwards hardly we will witness old style Conventional Warfare. Instead, we will encounter more of such like other forms. However the base line remains that, it is a war. In the case in point, war against biological agents.

With that as little background knowledge about warfare, now let me introduce you to another concept of Combat Ratio(CR). CR is the ratio between the Combat Potential of Defender with that of Attacker and vice versa, as may be the context. For a very long time in the military history, it was calculated purely based on Numerical Superiority ie number of soldiers physically standing on either side. However with the advent of technology and more realistic studies on lessons learnt after various battles, it was realised that, few other factors viz Firepower, No of Tanks and Technology being used by the opponents also contributes immensely in the Combat Potential of either of the fighting entity. Still, the results of analysis post various battles especially those with heroic gallant actions did not correspond to this theory. Further studies of Operational Art were carried out to refine the analytical results. Scholars arrived to a conclusion that it is not only the Tangible Factors (Physical) which contribute in the Combat Potential but also the Intangible Factors (Abstract) which, account for half the potential, if not more. These intangible factors include traits like Leadership, Morale, Training, Loyalty, Experience and Resolve to fight. Without these, calculating the Combat Ratio is a wasteful effort.

Intangible Factors

Let me support the concept mentioned above with a few examples from the history both recent and ancient as well as mythology.

  1. Most recent battle faced by Indian Army in the conventional domain was Kargil Conflict. Initial information was scanty, the number and type of enemy was unclear, the terrain was barren with least amount of cover and disposition of enemy was at comparatively much higher altitude than own. However, after initial obstructions, Indian Army finally succeeded in evicting the enemy who had intruded in our territory. Definitely old styled Combat Ratio did not win us the war, but the, the collective CR inclusive of courage of junior leaders, heroic actions by likes of Vikram Batra, Yogender Singh and Sanjay Kumar and absolute resolve and belief in the possibility of accomplishment of the mission won us the war.
  2. In 1965 Indo Pak War, Hajipir, one of the most treacherous pass on Pir Panjal Ranges approx 10 Km inside the enemy territory was captured by Maj Ranjit Singh Dayal and his team of Special Forces in most surprised manner while following a difficult approach through a Nala, without any reinforcement or added force. The major lessons learnt when extracted from this battle and taught till date comprised of Leadership, audacious and bold decision making & absolute physical and mental courage rather than numerical superiority or technological disparity.
  3. Going back further back in the history in the era of Sikh Battles. The Battle of Saragarhi in recent history under Havaldar Ishar Singh and Battle of Chamkaur Garhi (fort) Sahib under tenth Sikh Master Guru Govind Singh Ji is taught in most of the renowned universities till date as part of military history, where in a very small force of Sikhs spectacularly defeated or delayed till the defeat a comparatively much larger army of Afghans and Mughals respectively. In those too, the numerical superiority wasnt existing and technologically the winning side was much inferior but the result was otherwise. Credit goes to leadership, courage and belief in own collective capability to win.
  4. Going back farthest to Ramayana and Mahabharata, where in both the armies of Lord Ram and Pandavas backed by Lord Krishna were inferior in numbers, weapon systems, cavalry etc. However, the leadership and morale of the troops fighting in both these epics led to the victory of Vanar Sena and Pandavas despite fighting against Ravan’s army and Kauravas army led by best of the strategists of the era, viz Bhishma, Dronacharya, Karna etc and augmented by akshauni Sena of Lord Krishna.

World and national history is full of such examples.

However, having talked about intangible factors, now let me connect this to present day context.

We all know that whole world is presently engrossed in fighting this global pandemic with all their strengths. China, US and other European countries with best of scientific temperament, technological know-how and finest of the medical infrastructure are on their knees and are finding it difficult to flatten the curve. India on the contrary, till now, is being applauded by all across the globe for fighting the battle, much better than others, despite being one of the most populated country, with moderate standards of medical infra and technology and with a population majority of which is staying in villages with very little scientific temperament. So what could be the reasons which are still holding us up in comparably better shape till now other than our geographic location and temperature. What are the reasons we are not, like many other nations, protesting against the policies of govt, rather are supporting it like never before.

I believe these are those intangible factors like belief in our collective capability, trust in the hard work of doctors & other fighters, consequently sensing own responsibility to stay at home, and unbiased, united & apolitical leadership in these challenging times along with our national resolve to fight it out like a nation to come out victorious.

It is scientifically proved that stress reduces immunity. Persons with high BP or cardiac diseases are more prone to Corona infection and we know stress is one of the main reasons for both these ailments.

So in case, events like, ringing bells, creating metallic sounds collectively as a nation in an appreciative gesture towards Doctors and Nurses and lighting up candles and Diyas are adding to our resolve and reducing the anxiety and stress, how are they not adding up to our combat potential as a nation absolutely in line with the scientific approach.

Moreover, had these been happening ‘in lieu’ of other consolidated scientific measures being taken at every step, I would have agreed that these are not in sync with desired approach. But fortunately they are happening ‘in addn to’ and not ‘in lieu of’. Also, one of the logics I read that this is the time that leader should make the public aware about impending tough times. So for their relief, this is being done by various websites, apps and news channels specially dedicated for this purpose. Moreover, in the world of social media, there is a need to de clutter the information rather than to bombard people with overload.

Another astonishing thing for me is that, why is there no opposition to our countrymen cheering for national army during times of war, like we have seen in Kargil and previous wars when people have been standing on roads clapping for convoys moving to J&K or sending letters which hardly even reach them, offering prayers for our soldiers in respective houses and religious places. Are these practices in line with Scientific temperament ? But we never opposed then. Today, the only difference is that it s not the national army but nation as an army, is fighting this battle. Why shouldn’t we encourage each other and boost collective morale.

There is a recent study which says the major contributor of success be it professional or personal is Emotional Quotient rather than Intelligent Quotient, contrary to widely accepted concept. We are fortunate that this crisis is being handled with a very appropriate proportion of both EQ and IQ.

I am convinced, may be after going through this piece some of you also would have been by now. However, even if you haven’t, no need to stress, we live in a country where varied opinions are respected. More important is to be happy for you to maintain your immunity rather to agree to my personal thought process.

Thanks and keep safe

Iqbal Singh/ 05 Apr 2020

indiafightscorona

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क्यूं भारत विश्व की महाशक्तियों से बेहतर : Corona

क्या इन कारणों से अन्य देशों की अपेक्षा भारत में या भारत में भी शहरों की अपेक्षा गावों में कोरोना के केस कम पाए गए ??? विचार करने योग्य है!!

नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा जैसे छोटे से शहर/ गांव के मेरे बचपन और बड़े शहरों की जीवन शैली देखने के बाद अभी तक के अनुभव का व्यक्तिगत निचोड़।

१. हवादार घर जिनमें प्रचुर मात्रा में धूप आती है।

२. AC का प्रयोग नहीं।

३. शौच के बाद पेपर के स्थान पर पानी का प्रयोग।

४. राख़ से बर्तन साफ़ करने की विधि।

५. अधिकतर महिलाएं मशीन के बिना स्वयं अपने हाथ से कपड़े और बर्तन धोती हैं।

६. गांव में लगभग प्रत्येक घर में गाय या भैंस का दूध निकालना, वही शुद्ध दूध पीना, शुद्ध घी खाना।

७. घर की लिपाई के लिए या गौशाला की सफाई के लिए दिन में कम से कम एक बार गोबर से हाथ लथपथ होना।

८. शाम को मच्छर भागने या आग जलाने के लिए कंडों का प्रयोग करना।

९. रात को जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने का प्रचलन।

१०. कम गाडियां होने से या पब्लिक ट्रांसपोर्ट के अभाव से सम्मिलित यात्राएं बहुत कम और प्रदूषण कम।

११. RO ka पानी नहीं पीने से, बहुत ज्यादा साफ सफाई नहीं होने से, कम दवाइयां खाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक।

१२. अधिक हरियाली या पेड़ पौधे होने से शुद्ध वायु।

१३. लगभग प्रत्येक घर में एक तुलसी का पौधा।

१४. खाने में शुद्ध और ताज़े कुटे मसालों का प्रयोग जो कि शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाते हैं।

१५. प्लास्टिक और टपरवेयर के बर्तनों की जगह लोहे या स्टील के बर्तनों का प्रयोग।

१६. कम से कम फ़ास्ट फ़ूड या पैकेज्ड फ़ूड खाना। अधिकतर ताजा और गर्म खाना खाना।

१७. माइक्रोवेव का उपलब्ध ही ना होना।

१८. स्विगी, उबर ईटस, या Zomato जैसी सुविधाओं का ना होना।

१९. दिन में तीन से चार घंटे धूप में बैठना या काम करना।

२०. घरों में चाइनीज वुड या पीवीसी फ्लोर या पेनलिंग की जगह गोबर से या चूने की लिपाई होना।

आज साक्षरता अधिक प्रभावी है या ज्ञान।
नवीनीकरण सफ़ल है या पुरातन तकनीकें।

बस यूहीं विचार आया। प्रभु आप सभी को स्वस्थ रखें। देश और हमारे डॉक्टर्स इस युद्ध में कॉरोना पर विजय प्राप्त करें।। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻💪🏻💪🏻💪🏻

इक़बाल सिंह / २९ मार्च २०२०

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The Journey Begins

Thanks for joining me!

Good company in a journey makes the way seem shorter. — Izaak Walton

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